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महाराष्ट्र में मराठी अनिवार्यता पर बवाल: ऑटो-टैक्सी नियम टला, 100 दिन का अभियान शुरू

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महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने के फैसले पर विवाद बढ़ा। सरकार ने फिलहाल नियम टालकर 100 दिन का अभियान शुरू किया।

महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य करने के प्रस्ताव ने देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जहां एक ओर राज्य सरकार क्षेत्रीय भाषा और पहचान को बढ़ावा देने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस फैसले को लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, फिलहाल सरकार ने इस नियम को लागू करने से पीछे हटते हुए इसे अस्थायी रूप से टाल दिया है और इसके स्थान पर 100 दिनों का जागरूकता एवं प्रशिक्षण अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है, लेकिन इसके बावजूद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

दरअसल, महाराष्ट्र सरकार में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने पहले घोषणा की थी कि एक निर्धारित तारीख से सभी लाइसेंसधारी ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य होगा, जिसमें बोलना, पढ़ना और लिखना शामिल था, इतना ही नहीं, नियम का पालन न करने पर लाइसेंस रद्द करने जैसी सख्त कार्रवाई की भी चेतावनी दी गई थी, इस घोषणा के बाद परिवहन क्षेत्र से जुड़े संगठनों और चालकों के बीच चिंता बढ़ गई थी, खासकर उन लोगों में जो अन्य राज्यों से आकर महाराष्ट्र में रोजगार कर रहे हैं।

हालांकि, बढ़ते विरोध और संभावित सामाजिक प्रभाव को देखते हुए सरकार ने अपने रुख में नरमी दिखाई और इस नियम को तत्काल लागू करने के बजाय फिलहाल स्थगित कर दिया, अब इसे “काम के लिए आवश्यक मराठी” तक सीमित करते हुए 100 दिनों का विशेष अभियान चलाया जाएगा, जिसमें चालकों को भाषा सीखने और समझने का अवसर दिया जाएगा, सरकार का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य दंडात्मक कार्रवाई नहीं बल्कि लोगों को स्थानीय भाषा से जोड़ना है, ताकि सेवा की गुणवत्ता बेहतर हो सके और यात्रियों के साथ संवाद में आसानी हो।

इस फैसले ने उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में भी हलचल मचा दी है, जहां विभिन्न दलों के नेताओं ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी हैं, भाजपा नेता गुरु प्रकाश पासवान ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं और पहचान का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश के किसी भी नागरिक के अवसरों पर असर न पड़े, वहीं जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने सुझाव दिया कि जो लोग वर्षों से महाराष्ट्र में रह रहे हैं, उन्हें भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय और सहयोग मिलना चाहिए।

इसी मुद्दे पर निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद ने चिंता जताते हुए कहा कि इस तरह के फैसले सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकते हैं और सरकार को किसी भी नियम को लागू करने से पहले प्रशिक्षण और जागरूकता पर ध्यान देना चाहिए, वहीं आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने इसे एक असामान्य और कठोर आदेश बताते हुए कहा कि भाषाओं को लेकर टकराव पैदा करना ठीक नहीं है, क्योंकि भाषा लोगों को जोड़ने का माध्यम होती है, न कि उन्हें विभाजित करने का।

समाजवादी पार्टी के नेता माता प्रसाद पांडेय ने भी इस फैसले को लेकर चिंता जताई और कहा कि उत्तर प्रदेश के हजारों लोग महाराष्ट्र में रोजगार कर रहे हैं, ऐसे में इस तरह के नियम उनकी आजीविका पर असर डाल सकते हैं, कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए इसे संघीय ढांचे और मौलिक अधिकारों के संदर्भ में देखने की जरूरत बताई है, जिससे यह साफ होता है कि यह मामला केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन गया है।

आर्थिक आंकड़ों की बात करें तो देश के कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश और बिहार से आता है, जिनमें से कई लोग रोजगार के लिए मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में काम करते हैं, खासकर ऑटो-टैक्सी जैसे क्षेत्रों में इनकी संख्या काफी अधिक है, ऐसे में भाषा की अनिवार्यता जैसे कदम सीधे तौर पर उनके रोजगार और जीवनयापन को प्रभावित कर सकते हैं, यही वजह है कि इस मुद्दे को लेकर संवेदनशीलता और संतुलन बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी भाषा और “भूमिपुत्र” का मुद्दा नया नहीं है, इससे पहले भी शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसी पार्टियां इसे अपने राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता से उठाती रही हैं, ऐसे में मौजूदा फैसला भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है, हालांकि सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि स्थानीय भाषा को बढ़ावा देना है।

कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का संविधान हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में काम करने और व्यापार करने का अधिकार देता है, और इस संदर्भ में अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लेख किया जा रहा है, जिसके तहत भाषा के आधार पर रोजगार पर सख्त प्रतिबंध लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, यही कारण है कि सरकार ने फिलहाल सख्ती के बजाय जागरूकता अभियान का रास्ता अपनाया है।

कुल मिलाकर यह मुद्दा केवल भाषा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह क्षेत्रीय पहचान, रोजगार, संवैधानिक अधिकार और सामाजिक संतुलन जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़ गया है, आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस संतुलन को किस तरह बनाए रखती है और क्या यह अभियान वास्तव में विवाद को कम करने में सफल हो पाता है या नहीं।

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